गांवों से ओझल होती फगुआ की परंपरा, होलिका दहन में भी घट रही सहभागिताबदलती जीवनशैली के बीच फीकी पड़ती लोक संस्कृति की रंगत

गांवों से ओझल होती फगुआ की परंपरा, होलिका दहन में भी घट रही सहभागिता

बदलती जीवनशैली के बीच फीकी पड़ती लोक संस्कृति की रंगत

प्रमोद मिश्रा संवाददाता 

पट्टी। कभी फाल्गुन लगते ही गांवों की चौपालों पर ढोलक और मंजीरे की थाप गूंज उठती थी। फगुआ गीतों से पूरा वातावरण रंगीन हो जाता था। लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। गांवों में न तो पहले जैसी फगुआ की महफिलें सज रही हैं और न ही होलिका दहन में वैसी भीड़ उमड़ रही है जैसी वर्षों पहले हुआ करती थी।बुजुर्ग बताते हैं कि पहले होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर होता था। रात में चौपालों पर बैठकर लोग पारंपरिक फगुआ गाते, बच्चे उत्साह से भाग लेते और महिलाएं भी समूह बनाकर होली गीतों की स्वर लहरियां बिखेरती थीं। अब मोबाइल और टीवी की दुनिया में लोग सिमटते जा रहे हैं, जिससे सामूहिक आयोजन कम होते दिख रहे हैं।होलिका दहन के मौके पर भी अब गांवों में सीमित लोग ही पहुंचते हैं। जहां पहले पूरा गांव एकत्रित होता था, वहीं अब औपचारिकता निभाने भर की भीड़ नजर आती है। युवाओं की रुचि आधुनिक आयोजनों की ओर अधिक झुक गई है, जिससे पारंपरिक स्वरूप प्रभावित हो रहा है।
ग्रामीणों का मानना है कि यदि समय रहते इस सांस्कृतिक विरासत को बचाने के प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में ही फगुआ और पारंपरिक होली का जिक्र पढ़ेंगी। जरूरत है कि गांव स्तर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामूहिक आयोजनों को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि फगुआ की परंपरा फिर से जीवंत हो सके।फाल्गुन का महीना आज भी वही है, रंग भी वही हैं, लेकिन लोगों के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या हमारी लोक परंपराएं समय की धूल में खोती जा रही हैं?

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