गोपी लीला के साथ रूकमणी विवाह की पावन कथा में झूम उठे श्रोता ,ढाढर में बह रही भक्ति रस धारा

गोपी लीला के साथ रूकमणी विवाह की पावन कथा में झूम उठे श्रोता ,
ढाढर में बह रही भक्ति रस धारा 
पट्टी।उमरिया --- ढाढर गाँव में श्री मद भागवत कथा के छठवें दिवस की पावन कथा में गोपी लीला ,गोपेश्वर नाथ की स्थापना, श्री कृष्ण की अधर धर मुरली की महिमा का वर्णन करते हुए कंस उद्धार कथा का सरस,सगीत कहते हुए पूज्य पाद गुरू वर अवनीश धर व्दिवेदी जी श्री मुख से रूकमणी विवाह का रस की पान कराया। विर्दभ देश के राजा भीष्मक के लक्ष्मी स्वरुपा रूकमणी के रूप में जन्म लिया। रूकमणी ने मन ही मन अपने को भगवान के चरणों में समर्पित कर रखा था, किन्तु भाई रूक्मी ने अपने बहन के विवाह शिशुपाल से करने का निश्चय कर लिया था, तब रूकमणी ने बाम्हाण के हाथों से विवाह का प्रस्ताव श्री कृष्ण के पास भेजकर अपने समर्पण का संदेश दिया और बतलाया की मैं गौरी पूजन के लिए मंदिर आऊंगी, उसी समय आप मेरा वरण करिये । प्रेमावतार भक्त वत्सल श्री कृष्ण ने अपने भक्त के संकल्प को पूरा करने के लिए विदर्भ देश के राजा भीष्मक की राजकुमारी रूकमणी के वरण करने के प्रस्ताव पर सहमति देकर गौरी मंदिर पहुंच कर रूकमणी को अपने रथ पर बैठाकर चल दिये और इस बीच रूक्मी के साथ भारी युद्ध हुआ, रूक्मी को पराजित करते हुए उसके अभिमान का हनन करते हुए, देश भर के राजाओं जो शिशुपाल की बारात में अपनी विशाल सेनाओं के साथ पहुंचे थे,उन सबको सबक सिखाते हुए सबका मान मर्दन करते हुए रूकमणी को लेकर मथुरा पहुंचकर व्दारिकाधीश गुजरात के माधवपुर में गंधर्व विवाह कर रुकमणी का वरण किया है। रूकमणी जी साक्षात लक्ष्मी का अवतार मानी जाती है , जो भगवान के अलावा किसी और को समर्पित नहीं हो सकती।रूकमणी की यह जीत उनके सच्चे प्रेम और अटूट विश्वास की है। कथा के साथ सचित्र रूकमणी और व्दारिकाधीश की छवि प्रस्तुत होने से आज भगवान की भक्ति रस का पान किया। इस अवसर पर क्षेत्र के श्रद्धालुओं की अपार भीड़ पहुँच रही हैं।

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